Monday, March 13, 2017

मर रहे हैं गरीब, झुग्गी बस्ती वाले , खामोश क्यूँ हैं वह वतन-परस्ती वाले?

मर रहे हैं गरीब, झुग्गी बस्ती वाले ,
खामोश क्यूँ हैं वह वतन-परस्ती वाले?

वादा-ए-जन्नत-ए-अर्ज़ी किया था सियासतदानो ने,
क़त्ल-ए-आम कर दोज़ख क्यूँ दे गए वह झूटी हस्ती वाले?

रहते हैं हमेशा ग़रीबों के लफ्ज़-ए-दुआ में,
गुमशुदा हैं क्यूँ वह गरीब-नवाज़ खुदा सरबस्ती वाले?

जिसके सामने गुज़ारिश-ए-रहम की सितम-कशों ने,
सब के सब निकले क्यूँ दराज़-दस्ती वाले?

न आये खुदा, न सियासतदाँ, और न वतन-परस्त आये, ऐ हसरत,
मौत के बीच मंझधार से निकाले तब उनको वह तूती कस्ती वाले।

~स्नेह, ज्ञान, और सत्य;
हसरत बनारसी।

English Translation:
The poor, the hut-dwellers, and the villagers are dying,
why are the nationalists tight-lipped?

The politicians promised of the heaven on Earth,
why are those liars doing genocide, and giving them hell?

They are always in the prayers of the poor,
why are the omnipresent, kind to the poor Gods then missing?

In front of those whom the tyrannized pleaded for mercy,
why are they all turning out to be a tyrant?

Neither the Gods, nor the politicians, or the nationalists came, oh Hasrat,
the ones with the broken boats then saved them from the vortex of death.

~ Caritas, Lux, et Veritas;
Hasrat Benarasi.
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