Wednesday, December 23, 2015

Bachpan

बच्पन की दोस्ती कितनी हसींन होती है,
इसमें लेन-देन का नहीं होता हिसाब,
दोस्तों की ख़ुशी से खुश होते,
और उनके गम से उदास।
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चाहे ले लो हमसे हमारा धन सारा,
पर लौटा दो हमे बच्पन हमारा,
बहुत जी लिए हमने यह मनहूस जवानी के दिन,
थोड़ी मासूमियत और थोड़ी नादानी के बिन।

बहुत याद आते हैं हमे वह दिन पुराने,
दोस्तों के साथ बीतें वह पल सुहाने,
वह ख़्वाबों को पा लेने की उमीद,
वह रातों की चैन की नींद।

ले लो हमसे यह झूठी शान-ओ-शौखत,
और बदले में दे दो हमे भोले से चेहरे पे वह प्यारी सी मुस्कुहराहट,
वह शाम-सवेरे मीलों घूमना,
वह गिरना और फिर शंभालना।

जब हमे न था किसी से बैर,
और हम मांगते तेह सब की खैर,
क्या लौटा सकते हो हमे वह दिन,
हमे बताओ, ऐ अल्लाद्दीन के जीन।

~स्नेह, ज्ञान और सत्य;
एक अज्ञात कवि। 
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