Wednesday, May 2, 2012

प्रमाण

जिंदा हो तुम तो कुछ हरकत तो करो,
अपने जीवित होने के प्रमाण पत्र पर ज़रा दस्तखत तो करो,
समझ कर मृत दफ़न कर दिया था तुम्हे इस शरीरनुमा ताबूत में,
अगर जीवित हो बंद इसमें, तो इस ताबूत पर ज़रा दस्तक तो करो।

दौड़ते हुए मीलों, ज़िन्दगी की इस अंधी दौड़ में,
चढ़ते हुए सीढीयाँ, तरक्की की इस झूठी होड़ में,
आ गिर पड़े होकर क्लांत इस वीरान महलनुमा खंडहर में,
अगर कुछ जान हो बाकी इस शरीर-ए-खाक में,
तो कुछ पल सुकून भरी निद्रा हेतु उस खाट के तरफ, ज़रा दो कदम तो बढाओ।

देख कर खुद पर सितम, अपनी आँख मींच लिए,
पा कर खुद को असमर्थ, अपने हाथ खींच लिए,
समझ कर तुमको मूक, वह ढ़हाते गए तुम पर कहर,
अगर बचे हो कुछ अलफ़ाज इस सूखे कंठ में, तो ज़रा यह दास्ताँ-ए-जुर्म बयाँ तो करो।

समझ के गैर, छोड़ दिया तुमको बीच मझधार में,
समझ के दोषी, बंद कर दिया इस समाजनुमा कारागार में,
अगर हो दोषमुक्त तुम इस नापाक समाज में,
तो इस व्यथा के विरोध में ज़रा आवाज़ तो उठाओ।

समझ के उसको अनाथ, वह करते गए उसका शोषण,
समझ के उसको असहाय, वह करते गए उसका दोहन,
अगर कुछ संबंध हो बाकी उस जीव-ए-लाचार से,
तो उस आलौकिक रिश्ते के खातिर, ज़रा विद्रोह तो करो।

पूरी करते गए इस दिल की सारी व्यर्थ हसरत,
और प्रदर्शित करते गए अपनी झूठी शान ओ शौकत,
अगर बची हो इस व्यस्त जीवन में थोड़ी सी फुर्सत,
तो दो क्षण खुद से वार्तालाप तो करो।

~स्नेह, ज्ञान और सत्य;
हर्षद गुप्ता
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